Friday, July 8, 2022

Adhoori Mohabbat

 

तेरी  चिट्ठियां  में  अपनी  छत्त  पर , छुप  के  पढ़ा  करती  थी ,

धुले  कपड़ो  की  गीली  खुशबू  में , मुस्कुराया   करती  थी  |

कितनी  श्यामे  हमने  वहा , बिना  मिले  बितायी  थी ,

चिट्टी  की  एक  तरफ़ा  बातो  से , दो  तरफ़ा  महोब्बत निभाई थी |

 

 

याद  है  एक  बार , तुम्हारी गेंद  मेरी  खिड़की   पे  लगी  थी,

पापा  ने  बड़े  गुस्से  से,  वो  गेंद पकड़ी  थी |

दोस्तों  ने  खुशी  ख़ुशी  , तुम्हे  डाट  खाने  भेजा  था,

झुकी  नज़रो  से  तुमने  मुझे,  सामने  खड़ा  देखा  था |

मैंने  भी  पापा  के  साथ , तुम्हे  दो  बाते सुनाई  थी ,

ध्यान  से  खेलोये  ज्ञान  देके  गेंद  लौटाई  थी |

हल्का  सा  ही  सही , पर  तुम्हारी  उंगलियों  ने  मुझे  छुआ था,

एक  पल  के   लिए  हमने , खुले  आम  प्यार  का  इज़हार  किया  था |

 

तेरी  कितनी  ही  पतंगे  कट कर , मेरे  आंगन  में आयी  थी ,

भाई  ने  पर  कभी  उन्हें,  वापस  ना  लौटाई  थी |

बुरा    मानना , मैंने  ही  उसे  मना  किया  था ,

तेरे  आंगन  से  आयी  चीज़ो  को,  लौटाने  का  मन    किया  था |

 

एक  बात  और  है,  जो  तुम्हे  पता  नहीं ,

पर  शायद  अब,  इन  चीज़ो  का  वक़्त  रहा  नहीं |

केह देती  हु  फिर  भी  तुम्हे , क्योकि आज  दिल  जज़्बाती  है ,

वक़्त  बहुत  बीत  गया , पर  याद  तेरी  आज  भी  आती  है |

तेरी  चिट्ठियों को  में  छत पे  ,छुप  के  आज  भी  पढ़ा करती  हु,

धुले  कपड़ो  की  गीली  खुशबू  में , मुस्कुराया करती  हु |

बिना  मिले  कभी  कभी , तुमसे बाते भी हो जाती है

चिट्टी  की  एक  तरफ़ा  बातो  से ,

अधूरी  महोब्बत की  तम्मना  पूरी   हो  जाती  है |

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